Thursday, November 19, 2020
Friday, October 2, 2020
विश्वकर्मा एकीकरण अभियान पत्रिका का विमोचन लखनऊ में संपन्न
लखनऊ, 2 अक्टूबर। वर्तमान समय में संचार माध्यम देश और समाज की प्रगति और सूचनाओं के आदान प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। विश्वकर्मा एकीकरण अभियान पत्रिका समाज में जन चेतना जगाने के साथ साथ समाज के एकीकरण में भी सहायक होगी।
उक्त विचार विश्वकर्मा एकीकरण अभियान के केंद्रीय संचालक ई. राम नरेश शर्मा ने ककुहास पांचाल ब्राह्मण सभा के तत्वाधान में विश्वकर्मा मंदिर मकबूलगंज में आयोजित गांधी-शास्त्री जयंती और पत्रिका विमोचन के अवसर पर व्यक्त किये। उन्होने कहा कि विश्वकर्मा समाज में राजनैतिक चेतना जाग्रत कर बिखरे विश्वकर्मा समाज का एकीकरण करने में विश्वकर्मा एकीकरण अभियान पत्रिका का महत्वपूर्ण योगदान है।
इस अवसर पर ककुहास पाचांल ब्राह्मण सभा लखनऊ द्वारा एवं भाजपा युवा नेता द्वय ई.शिवेन्द्र शर्मा व विनोद शर्मा द्वारा पत्रिका के सम्पादक नरेश पांचाल को सम्मानित किया। सभा की अध्यक्षता श्री राम कैलाश शर्मा ने की संचालन राम भजन शर्मा ने किया। इस अवसर पर सुरेश चन्द्र विश्वकर्मा महामंत्री, कामता प्रसाद कोषाध्यक्ष, महेश प्रसाद शर्मा उपाध्यक्ष सहित महावीर प्रसाद विश्वकर्मा, काशी प्रसाद शर्मा, श्री राम शर्मा, पन्ना लाल शर्मा, मोहन लाल शर्मा, अशोक कुमार विश्वकर्मा, सत्येन्द्र अग्निहोत्री, श्यामबाबू शर्मा सहित अनेक विश्वकर्मा बंधु उपस्थित रहे।
Thursday, June 4, 2020
एकीकरण से सत्ता की ओर....... - नरेश पांचाल
विश्वकर्मा समाज देश के
विभिन्न भागों में अलग-अलग नाम से जाना व पहचाना जाता है। तीस उप जातियों व उप
नामों के कारण इतने बडे समाज को संगठित कर राजनैतिक स्तर पर पहचान बना कर सत्ता का
लाभ हासिल करने में कदम-कदम पर बाधाएं आ रही हैं। समाज के अगुआ कहे जाने वाले
महत्वकांक्षी नेताओं की संकुचित मानसिकता विश्वकर्मा समाज की एकता और उसके विकास
में सबसे बड़ी बाधा है।
आज
देश में विश्वकर्मा नाम के अतिरिक्त बढ़ई महासभा, लोहार महासभा, टांक महासभा,
धीमान महासभा, पांचाल महासभा और न जाने कितने अलग-अलग नामों से संगठन और सभाएं चल
रही है। और सभी का एक मात्र लक्ष्य विश्वकर्मा समाज का चहुमुखी विकास और सत्ता में
भागेदारी है। लेकिन बिखराव के कारण कोई भी राजनैतिक दल इतने विशाल समाज का
मूल्यांकन नहीं कर रहा है। नतीजन हमारा समाज विकास की दौड में पिछडे वर्ग की
अपेक्षाकृत कम जनसंख्या वाली जातियों से पीछे है।
इन्हीं
सब समस्याओं पर गंभीर चिन्तन और मनन के
बाद 9 जून 2002 को विश्वकर्मा एकीकरण अभियान का सूत्रपात हुआ। समाज के तेजतर्रार
आई.ए.एस. अधिकारी रहे श्री जे.एन. विश्वकर्मा जी ने अपने प्रशासनिक सेवा काल में
समाज की दशा और दिशा को करीब से समझा और देखा। सामाजिक संगठनों के क्रिया कलाप और
सामाजिक नेताओं की कार्यपद्धति और उनकी व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं का अध्ययन किया।
उन्होनें देखा कि विभिन्न नामों से चल रहे विश्वकर्मा समाज के संगठनों को एक कर
पाना कठिन ही नहीं बल्कि असंभव कार्य है।
इस
लिये श्री जे.एन. विश्वकर्मा ने समाज के ज्येष्ठ और श्रेष्ठ विद्वत जनों के साथ
मंत्रणा कर विश्वकर्मा एकीकरण अभियान शुरु किया। अभियान की 16 वीं वर्षगांठ पर 88000 ऋषियों की तपोभूमि एवं पौराणिक तीर्थ
स्थल नैमिषारण्य (सीतापुर) उ.प्र. में बहुत ही भव्य और दिव्य तरीके से मनाई गई।
जिसमें देश के विभिन्न भागों से आये विश्वकर्मा समाज के लोगों व स्वयं सेवकों ने
प्रतिभाग किया।
विश्वकर्मा
एकीकरण अभियान का लक्ष्य देश भर में विभिन्न नामों से चल रहे सामाजिक संगठनों
यथा-स्थिति में चलते हुए बिना किसी विलय के अपने लक्ष्य के प्राप्ति के लिए एकिकृत
करना है। सामाजिक एकता आन्तरिक और एकीकरण एक बाह्य प्रक्रिया है। हमारा लक्ष्य
विश्वकर्मा समाज को संख्या बल के अनुरूप सत्ता में भागेदारी सुनिश्चित कराना है।
जिसके लिये एकीकरण आवश्यक है। अभियान अपने
16 वर्षों की अनवरत यात्रा में उत्तर प्रदेश में ही नहीं सम्पूर्ण भारत में पहचान
बना चुका है। लेकिन अभी हम उस लक्ष्य को प्राप्त कर पाने में सफल नही हो सके है।
जिसके लिये यह अभियान शुरू किया गया है। लेकिन देश भर में अभियान के तहत अब तक
आयोजित हो चुकी जन सभाओं और समाजिक गोष्ठियों में उमड़े जन समूह को देख कर
राजनैतिक दलों में यह सुगबुगाहट होने लगी कि अब विश्वकर्मा समाज को ज्यादा दिनों
तक उपेक्षित नही रखा जा सकता । परिणाम यह हुआ कि सपा, बसपा, कांग्रेस, भाजपा और
अन्य क्षेत्रीय दलों ने विश्वकर्मा समाज को राजनैतिक क्षेत्र में काम करने वाले
बन्धुओं को महत्व देना शुरू कर दिया। लेकिन जो लक्ष्य हमें प्राप्त करना है वह अभी
दूर है। इसके लिये निरन्तर सामाजिक सक्रियता की जरूरत है।
स्मरणीय
है कि विश्वकर्मा एकीकरण अभियान गैर राजनैतिक है लेकिन इसका लक्ष्य विभिन्न
माध्यमों से सत्ता में समाज की भागेदारी है। राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय भूमिका
अदा करने वाले बंधुओं के लिए अभियान एक संजीवनी है।
विश्वकर्म
एकीकरण अभियान और उसके स्वयं सेवक किसी राजनैतिक दल के बंधुआ मजदूर नही अपितु
समाजके स्वैच्छिक कार्यकर्ता है। जो राजनैतिक दल हमारे समाज के नौजवान, युवा
साथियो और राजनैतिक क्षेत्र में का करने वालों क सत्ता मे भागेदारी सुनिश्चित
करेगा अभियान का स्वयं सेवक उसके लिये समर्पित रहेगें। विश्वकर्मा समाज की उपेक्षा
करने वालों का करारा सबक सिखाने में भी अभियान के स्वयं सेवक पीछे नहीं रहेंगे।
आज
जरूरत है प्रत्येक स्वजातीय सामाजिक संगठन से जडे सक्रिय कार्यकर्ताओं से बिना
अपनी पहचान गवाएं और अपने संगठन का अस्तित्व बनाये रखते हुए इस अभियान से स्वयं
सेवक के रूप में जुडने की। अभियान प्रत्येक परिवार से यह अपेक्षा करता है कि वह
अपने परिवार से एक सदस्य को इस अभियान से अवश्य जोडे। जिस दिन हम प्रत्येक
विधानसभा क्षेत्र में 250 सक्रिया स्वयं सेवकों की टीम तैयार करने में सफल हो
जायेंगे उस दिन कोई भी राजनैतिक दल विश्वकर्मा समाज की उपेक्षा और कोई भी असमाजिक
तत्व उत्पीडन का साहस नहीं जुटा सकेगा।
तो
आइये आज हम संकल्प लें कि अपने परिवार के एक सदस्य को इस अभियान से अवश्य जोडेंगे।
क्योंकि अभियान के माध्यम से ही हम राजनीतिक सत्त में भागेदारी हासिल कर सकते है।
जो हमारा लक्ष्य है।
“हमारी मंजिल है एकीकरण और
हमारा लक्ष्य है सत्ता में भागेदारी”
Wednesday, November 6, 2019
वैदिक विज्ञान एवं व्यवस्था
पंचशील
Tuesday, November 5, 2019
भगवान श्री विश्वकर्मा-तुलसी राम शर्मा (से.नि. सेशन जज)
हमारा
जांगिड ब्राह्मण समाज बड़ा ही भाग्यशाली है कि उसने भगवान विश्वकर्मा को अपने
आराध्य देव के स्वरूप में ह्र्दयंगम किया। इस संबंध में कई प्रश्न उठ खडे हुये
हैं। कोई पूछता है कब और सर्व प्रथम किस ऋषि-महर्षि अथवा अन्य महापुरुष ने यह
नामकरण किया? इस नाम को किस मतलब से लिया? इसके पीछे क्या उद्देश्य रहा होगा? अब
लोग इसका क्या अर्थ लगाते हैं? क्या ये देव शिल्पी थे? या परम पुरुषोत्तम
परमात्मा? इत्यादि-इत्यादि।
बगैर शास्त्रों में
उलझे यदि हम अपने आराध्य देव का ज्ञान साधारण मानवीय विचार अथवा स्वतंत्र बुद्धि
से अनुमान के आधार पर विश्लेषण करें तो सर्वप्रथम हमारे मन में स्वाभाविक धारणा
उत्पन्न होती है कि इस पृथ्वी लोक में मानव कब से विद्यमान है और कब वह सोच-विचार
के स्तर पर पहुंचा, कि “विश्व” किसे कहते हैं। मानव ने इस अलौकिक धराधाम पर विचरण
कर देखा कि यहां कैसे-कैसे पहाड़ हैं, कैसी जलधारायें (नदियां) बह रही हैं,
कैसे-कैसे विशाल समुद्र हैं, कैसे-कैसे गहन जंगल हैं, कैसी समतल कृषि योग्य भूमि
है? इस प्रकार पृथ्वी के भूतल का ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद मानव ने आकाश की और
देखा । उसमें सूर्य-चंद्र-ग्रह-नक्षत्र, तारिकायें देख वह और भी अधिक
आश्चर्यचकित हो गया। यह नजारा देखकर मानव
ने इस असीम दृश्य जगत को “विश्व” कहकर पुकारा। इस अत्यंत अद्भूत रचना को देखकर वह
विस्मय सागर मे डूब गया। वास्तव में यह सृष्टि अत्यंत विस्मयकारी है ही। यह
विस्मयकारी दृश्य देखकर बुद्धि सम्पन्न मानव ने सोचा इस सम्पूर्ण विराट दृश्य को
बनाने वाला भी तो कोई होना चाहिये? उसका इतने सुचारु रूप से नियंत्रण-संरक्षण करने
वाला भी तो कोई होना चाहिये?
अब हमें यह कहने में कोई संकोच
नहीं होना चाहिये कि हमारे विद्वान महापुरुषों ने इस भौतिक जगत के निर्माता के रुप
में “भगवान श्री विश्वकर्मा” को स्वीकारा। अर्थात “विश्व” से तो यह सर्व दृश्य जगत
को समझा और “कर्मा” के रूप में उस अदृश्य शक्ति को स्वीकारा जिसने इस जगत की रचना
की जो इसकी सुरक्षा व संचालन कर रहा है। यही विश्व का परमपिता परमेश्वर है, विधाता
है, परब्रह्म परमात्मा है, भगवान है। अनन्त नामों से पुकारा जाता है। कोई God
कहता है तो कोई “अल्लाह”
कहकर संबोधित करता है।
यह कहना कठिन नहीं है, किस
साल-सम्वत अथवा युग में हमारे मनीषी पूर्वजों ने इस सृष्टि को निर्माता का नामकरण
“भगवान श्री विश्वकर्मा” से किया? क्योंकि सृष्टि रचियता का तर्क संगत नामकरण
सर्वप्रथम हमारे पूर्वजों द्वारा किया गया, इसमें तनिक भी संदेह नहीं हो सकता। यही
कारण है कि प्राचीन काल से भगवान श्री विश्वकर्मा के मन्दिर बनते आ रहे हैं और आज
भी बन रहे हैं। हमारा समाज आज भी उसी तत्परता एवं भक्ति भाव से भगवान श्री
विश्वकर्मा जी का यजन-पूजन कर रहा है। सर्व समर्थ-सर्व व्यापी-सर्व शक्तिमान
परमेश्वर की आराधना का यही तो वैज्ञानिक एवं तर्क संगत मार्ग है।
हमारी आर्य संस्कृति हजारों साल
पुरानी है। एक समय वैदिक काल का बोलबाला था। हमारे वेद-शास्त्रों में उसका विश्द
विवरण मिलता है। विदेशी आताताइयों के आगमन से हमारी संस्कृति भारी आघातों को सहती
आई है। कई प्राचीन ग्रंथ लुप्त हो गये,कई आताताइयों ने नष्ट कर दिये और कई विदेशी
संग्रह कर्ताओं के हवाले हो चुके हैं। यही कारण है कि हमारे समाज के सम्बन्ध में
जो प्राचीन पठनीय सामग्री थी वह लुप्त हो चुकी है। उसके अभाव में हमारे समाज की
सांस्कृतिक विरासत समाप्त सी प्रतीत होती है। फिर भी प्राचीन नामकरण के आधार पर हम
कम से कम इतना अनुमान तो लगा सकते हैं कि हमारे प्रबुद्ध दार्शनिक मनीषी पूर्वज ऋषि-मुनियों
ने इस विस्मयकारी अखण्ड ब्रह्माण्ड के आधारभूत इसके रचनाकार, संरक्षक, पालनहार एवं
संवरण कर्ता के रूप में देवाधिदेव भगवान श्री विश्वकर्मा जी को ही अपना आराध्य देव
चुना। यह परम्परा अनादिकाल से ज्यों की त्यों बिना किसी विकृति या परिवर्तन के आज
तक बदस्तूर चली आ रही है और आज भी भगवान विश्वकर्मा जी को भव्य मंदिरों में
प्रतिष्ठित कराया जा रहा है और विशुद्घ भक्ति भाव से निरंतर पूजन-यजन किया जा रहा
है।
यह सत्य है कि इसके बाद रचे गये
धर्मशास्त्रों में सृष्टि की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय के सम्बन्ध में विविध विवेचन
हुआ हो। हमारे परम पावन शास्त्र श्री मद् भागवत महापुराण में ही (द्वितीय स्कन्ध
पंचम अध्याय) ब्रह्माजी द्वारा ब्रह्मऋषि नारद को सृष्टि रचना का क्रम बताने का
उल्लेख है। पुनः तृतीय स्कन्ध अध्याय 5 से 12 में इसी विषय पर विस्तार से चर्चा
हुई है। इस प्रमाणिक सद्गन्थ में भी एक स्थान पर भगवान विश्वकर्मा के सम्बन्ध में
उल्लेख है। लेकिन उनके प्राकट्य के विषय में कोई चर्चा देखने में नहीं आती। अष्टम
स्कन्ध अध्याय 13 में यह उल्लेख अवश्य है कि भगवान सूर्य देव की दो पत्नियां
संज्ञा व छाया थीं वे भगवान विश्वकर्मा जी की पुत्रियां थीं। आगे चल कर उनकी
सन्तानों के विषय में चर्च मिलती है।
भले ही दीर्घ कालीन पौराणिक कथायें
हमारी अनवरत मान्यताओं से मेल नहीं भी खाती हो फिर भी यह जानकर हमारा विश्वास और
अधिक सुदृढ़ हो जाता है कि पुराणों में भी
कहीं-कहीं हमारे आदिदेव भगवान श्री विश्वकर्मा जी का किसी न किसी रूप में उल्लेख अवश्य
मिलता है। इससे स्पष्ट संकेत भी मिलता है कि प्रचीनतम काल से यानी इन प्राचीन धर्म
शास्त्रों से भी पहले हमारे आराध्य देव मानव समाज के मानसिक पटल पर विद्यमान थे।
इस सृष्टि के परमपिता परमेश्वर के रूप उनके प्रति हमारी मान्यता शत-प्रतिशत
शास्त्र सम्मत होते हुए वैज्ञानिक दृष्टि
से भी सर्वथा उचित है।
-तुलसी राम शर्मा (से.नि. सेशन जज)
जयपुर फोन – 0141-2706129
महापुरुषों से प्रेरणा लेकर समाजोत्थान की दिशा में आगे बढें।
Monday, August 12, 2019
अभियान दिवस कार्यक्रम- विश्वकर्मा मंदिर लखनऊ, उत्तर प्रदेश
विश्वकर्मा एकीकरण अभियान वर्ष २००२ से समाज को विभिन्न माध्यमो से सत्ता मे भागीदारी दिलाने के लिए काम कर रहा है । हमारा लक्ष्य सदियो से शोषित पीड़ित और उपेक्षित विश्वकर्मा समाज को उसकी संख्या बल के अनुरूप सत्ता मे भागीदारी दिलाने का है। सत्ता मे भागीदारी का मतलब केवल सांसद और विधायक बनना ही नही अपितु डाक्टर, इंजीनियर, वकील, पत्रकार, पुलिस और प्रशासन के अधिकारी बन कर भी समाज को बदलने का काम किया जा सकता है । क्योंकि समाज निर्माण के लिए सभी के सहयोग की जरूरत होती है । विश्वकर्मा एकीकरण अभियान समाज को सर्व समाज मे बराबरी का दर्जा दिला कर गौरवशाली अतीत का स्मरण कराते हुए परमवैभव के शिखर तक ले जाने के लिए कृत संकल्प है । जिसके लिए प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र मे अभियान के २५० स्वयंसेवक तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसमे अभियान से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की सहभागिता हो सके। अभियान के प्रदेश प्रभारी नरेश पांचाल ने कहा कि पिछले १७ वर्ष से चलने वाले इस अभियान को अबतक आपेक्षित सफलता नही मिल सकी है। लेकिन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अब हम सबको कृत संकल्प लेना चाहिए बिना संकल्प के हम किसी मुकाम पर नही पहुंच सकते ।इसलिए अब सभी स्वयंसेवको से अपेक्षा है कि वह इस अभियान के लिए तन मन से जुड़े ।इस अवसर पर केंद्रीय संचालक रामनरेश शर्मा, रामसुमिरन शर्मा, प्रांतीय संचालक राम मनोहर वर्मा आशीष शर्मा, गोपाल जी शर्मा, महेश योगी, रमाशंकर शर्मा, डा मंजू विश्वकर्मा, मेजर जे पी शर्मा, इं राकेश शर्मा, बेचू विश्वकर्मा, भुआल विश्वकर्मा, डा राजेश विश्वकर्मा,अशोक शर्मा, अजय सोनी,महेंद्र विश्वकर्मा, काशी प्रसाद, विजय कुमार, प्रेम नारायण, गौरव धीमान, विनोद विश्वकर्मा, मनोज साहा,मोहन लाल, मीना विश्वकर्मा, फूल चंद्र विश्वकर्मा, कमलेश प्रताप विश्वकर्मा, अरविंद विश्वकर्मा, पवन शर्मा,गौरीशंकर विश्वकर्मा, शिव वली विश्वकर्मा, त्रिभुवन शर्मा, सुरेश चंद्र विश्वकर्मा, राम कैलाश शर्मा, राम भजन शर्मा, चंद्र भान विश्वकर्मा, संतोष कुमार शर्मा, फूल चंद्र विश्वकर्मा, ब्रज कुमार शर्मा सहित अन्य विश्वकर्मा बंधु उपस्थित हुए।
Tuesday, November 6, 2018
Sunday, August 12, 2018
सत्ता ही वह कुंजी है जो किसी समाज के विकास का रास्ता खोलती है – जे.एन. विश्वकर्मा
Wednesday, July 25, 2018
महत्वपूर्ण सूचना
पदाधिकारियों
की श्रेणी
|
स्वयंसेवक
शुल्क
|
वार्षिक
अंशदान
|
प्रमुख
|
100
रुपये मात्र
|
5000
रुपये मात्र
|
उप
प्रमुख
|
100 रुपये मात्र
|
4000 रुपये मात्र
|
केन्द्रीय
संयोजक
|
100
रुपये मात्र
|
3000
रुपये मात्र
|
अन्य
केन्द्रीय पदाधिकारी
|
100 रुपये मात्र
|
2000 रुपये मात्र
|
प्रदेश
प्रभारी,सह प्रदेश प्रभारी, संयोजक
|
100
रुपये मात्र
|
2100
रुपये मात्र
|
प्रदेश
के अन्य पदाधिकारी
|
100 रुपये मात्र
|
1100 रुपये मात्र
|
मण्डल
प्रभारी, सह प्रभारी, संयोजक
|
100
रुपये मात्र
|
1500 रुपये मात्र
|
मण्डल के
अन्य पदाधिकारी
|
100 रुपये मात्र
|
1000 रुपये मात्र
|
जिला
प्रभारी, सह प्रभारी, संयोजक
|
100
रुपये मात्र
|
1200
रुपये मात्र
|
जिले के
अन्य पदाधिकारी
|
100 रुपये मात्र
|
750 रुपये मात्र
|
तहसील
प्रभारी, सह प्रभारी , संयोजक
|
100
रुपये मात्र
|
500
रुपये मात्र
|
तहसील के
अन्य पदाधिकारी
|
100 रुपये मात्र
|
250 रुपये मात्र
|
ब्लाक
प्रभारी, सह प्रभारी, संयोजक
|
100 रुपये मात्र
|
200
रुपये मात्र
|
ब्लाक के
अन्य पदाधिकारी
|
100 रुपये मात्र
|
150 रुपये मात्र
|
साधारण
स्वयंसेवक
|
100
रुपये मात्र
|
-
|








