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Tuesday, April 3, 2018

साहस सफलता की कसौटी है-दीपचंद सुथार

दीपचंद सुथार
जोधपुर, मो- 9530051273
व्यक्ति एक चिंतनशील प्राणी है। वह समाज में रहते हुए अपने कार्य में सदैव व्यस्त रहता है, कुछ-न-कुछ सोचता रहता है। वह क्या सोचता है ? यह उसका व्यक्तिगत सवाल है। परन्तु मन बहुत ही चंचल है। यह एक पल भी विश्राम नहीं करता है। यदि यह सोच अपने जीवन को ऊँचा उठाने की प्रक्रिया से जुड़ा है तो प्रसन्नता की बात है। क्योंकि सही सोच ही सफलता की श्रेष्ठ कुंजी है। इस राह में कई बार रूकावटें आती रहतीं हैं। यदि वह इनसे घबरा जाता है तो उसका विकास वहीं रूक जाता है, लेकिन जो व्यक्ति इन बाधाओं का हिम्मत के साथ सामना करता है वह मंजिल तक पहुंच जाता है। संसार में जीतने भी महापुरूष, वैज्ञानिक,आविष्कारक, शूरवीर, खोजक, देशभक्त इत्यादि हुए हैं, उनका व्यक्तित्व व कृतित्व हमारे लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। अतः अनुगामी बनकर सीखने का प्रयास करना चाहिए। ऐसी जिज्ञासा ही हमारे सोच को सही दिशा की ओर ले जाने की क्षमता रखती है। वैसे देखा जाए तो सुख-दुःख हमारे जीवन का पेण्डुलम है। परन्तु यथार्थ सीख राह की कठिनाइयां ही देती हैं। इसी को लक्षित करते हुए किसी कवि ने उचित ही कहा है-
अगर कांटों से गुजरना ना होता, तो जीवन का आभास न होता।
मंजिल, मंजिल  ही रह जाती, मानव का इतिहास न होता।।
यथार्थ में इतिहास व्यक्ति की श्रम बूंदों से ही लिखा जाता है। ये ही उसकी अन्तस निहित साहस का सुमधुर संगीत है। जो इंद्र धनुष की तरह उसकी प्रतिमा के रंगों को बिखेर कर सभी को अपनी ओर आकृष्ट कर देता है। अतः इससे कभी घबराना नहीं चाहिए, बल्कि दृढता के साथ सामना करना चाहिए। इसी को इंगित करते हुए मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन ने उचित ही लिखा है-
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभीं हार नही होती।
अतः स्पष्ट है कि हम बाधाओं को चुनौती देकर अपने सपनों को साकार कर सकते हैं। किसी विद्वान ने कहा है कि-  वह व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है जो हालात को मुँह तोड जवाब देता है। इसी को लक्षित करते हुए कवि ने अपने साहसी उद्गारों को निम्न प्रकार प्रस्तुत किया है-
जो जहाज को डुबो दे , उसे तुफान कहते हैं। जो तुफान से टक्कर ले, उसे इंसान कहते हैं।।
प्रगतिशील व्यक्ति ऐसे ही विचारों के धनी होते हैं, जो पथ में आने वाली मुसीबतों का साहस, धैर्यता, कर्मष्ठता और संकल्प के साथ सामना करते निर्भय होकर निरन्तर बढ़ते रहते हैं। वे ही अभीष्ट को अर्जीत करते हैं। इस संदर्भ में भी किसी कवि ने अपने बेमिसाल शब्दों में ठीक ही कहा है कि-
जिन्दगी काँटों भरा सफर है, हौसले इसकी पहचान हैं। 
रास्तों पर चलते सभी है, जो रास्ता बनाए वह महान है।।
अतएव साहस ही हमारे जीवन का मुख्य आधार है। इसके बिना जीवन नीरस प्रतीत होता है। राजिया के शब्दों में भी कितनी यथार्थता झलकती है देखो-
हिम्मत कीमत होये, बिन हिम्मत कीमत नहीं। करे न आदर कोय, रह कागद ज्यूं राजिया।।
हिम्मत में अद्भूत शक्ति छिपी होती है। भाषा सार संग्रह दूसरा भाग पृष्ठ 62 से ज्ञात होता है कि- मोली नामक एक स्पेन देश का मुखिया किसी समय पीडित अवस्था में अपनी शय्या पर पड़ा था और उसकी सेना पुर्तगाल वालों से लड रही थी, जब उसने सुना की मेरी सेना हार रही है, तब उससे न रहा गया  और व्याकुल हो उसी अवस्था में साहस कर वह शय्या से कूद पड़ा और पुरूषार्थ के बल से दौड़ाता हुआ रणभूमि में आकर शत्रुओं से लडने और अपनी सेना के वीरों को ललकारने लगा। इस पीडित व्यक्ति को लडते देख उसके वीरों में ऐसा साहस और पुरूषार्थ उमड़ा और वे शत्रुओं से ऐसा जी खोलकर लड़े कि बैरियों के छक्के छूट गए और उनसे भागते ही बन पड़ा। उस लड़ाई के पीछे मोली मोलिक घर पर आया और अपनी शय्या पर लेटते ही मर गया।
इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि साहस में कितनी शक्ति है समाहित है ? ऐसी कई घटनाएं पढने को मिलती हैं , जो हमारे भीतर सोयी शक्ति को जागृत कर हार को जीत में बदल देती हैं। इस शक्ति को पहचानने का प्रयास करना चाहिए और मुसीबतों से कभी घबराना नहीं चाहिए। क्योंकि साहस सफलता की कसौटी है। तभी तो पुरूषार्थी कहते है-
आँधियों से कह दो जरा औकात में रहें। हम परों से नहीं , हौसलों से उड़ा करते हैं।।
अतः हौंसलों से उड़ान भरने बाले ही अपने जीवन को सार्थक बना अतीत के आंगन में रोशनी फैला सकते हैं । तभीं तो स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- पीछे मत देखों , आगे देखो। अनंत उत्साह,अनंत साहस और अनंत धैर्य के सहारे ही महान कार्य किए जा सकते हैं।


Monday, April 2, 2018

माँ-आर. पी. शर्मा (जांगिड)

हमारा देश यहाँ की पावन संस्कृति की दृष्टि से अन्य सभी देशों से अलग पहचान रखता है। यहाँ संस्कृति और श्रेष्ठ परंपराओं की दुहाई दी जाती रही है। भारत ऐसा देश है, जिसको भारत माँ अर्थात् मातृभूमि के रूप मे मानते हैं, क्योंकि प्राचीन काल से जन्मस्थली भी यही रही है और कर्म स्थली भी यही रही है। हमारे देश के शास्त्रों में, पुराणों, ग्रंथों आदि में माँ शब्द का इतना महत्व बताया गया है, जिसकी सम्पूर्ण व्याख्या करना इतना आसान नहीं है। माँ दुर्गा, माँ शारदे, माँ लक्ष्मी, माँ गंगा और न जाने कितनी  ही दैवीय शक्तीयों का माँ के रूप में इस धरती पर अवतरण हुआ। युगों-युगों से इनका आश्रय मिला। इनकी सद्वाणीयों , लीलाओं से प्रशस्त मार्ग का दर्शन मिला। माँ ममता की मूरत, माँ शब्द  को सुनने से ही विशेष अनुभूति , माँ शब्द बोलने में ही कितना अपनत्व लगता है। नारी जब तक माँ नहीं बनती तब तक वह अपने आप में पूर्ण नहीं होती । नारी के माँ बनने की कल्पनाओं मे भी कितना सुलभ अहसास होता है, जो केवल नारी ही जानती है। नारी के गर्भ में जब उसको बच्चे का पता लगता है तो वह अपने आप को उसी दिन से बच्चे के लिए निःस्वार्थ भाव से समर्पण कर देती है। उस हेतु स्वादिष्ट व्यंजन त्याग देती है और वही खाती है जिससे उसकी सेहत बनी रहे। 24 घण्टे उसी का ख्याल रखती है। अपने रक्त से उसको सिंचित करती है। जब बच्चा नौ माह बाद इस संसार में आता है तो माँ की खुशी का ठिकाना नहीं रहता और उसकी अलग ही दुनिया हो जाती है। उसको स्तनपान करवाती है, अगर कोई छोटी सी चोट भी लगती है तो उसे पहाड सी लगती है। किसी भी प्रकार की कोई आंच नहीं आने देती। यहाँ तक  की बीमारी मे रात-रात जागती है। स्वयं गीले मे सोती है और उसे सुखे में सुलाती है, वो उसकी हर पसंद दृनापसंद को समझती है । माँ बच्चे की पहली पाठशाला होती है। इसलिए उसे धुरी कहा गया है। अर्थात प्रारम्भ में जो कुछ सीखना है , वह माँ के द्वारा ही सीखे और लालन पालन का भी उसी की जिम्मेदारी है अतः उसी की देखरेख व परिवार के सानिध्य मे भरण पोषण होता है और यही कारण माँ और संतान में अटूट रिश्ता झलकता था। किन्तु आज वह...................?
आज के परिपेक्ष्य में हम देखते हैं, जिस दिन डॉ. बताता है कि वो माँ बनने वाली है उसी दिन से नौ माह तक उस डॉक्टर को बच्चे को सुपुर्द कर देती है। जब वह जन्म लेता है तो खुशी मनाते हैं लोगो  को इक्ठ्ठा कर लेते हैं , उपहार बांट देते हैं। कुछ माँ अपने बच्चे को स्तनपान नहीं करातीं क्योंकि उससे फिगर बदल जाता है। दो वर्ष का इंतजार करते ही प्ले स्कूल में या बोर्डिंग स्कूल में डाल देते हैं। थोडा बड़ा हो जाता है तो उच्च शिक्षा के लिए दुर-दराज या विदेश में भेज देते हैं। क्या यह सब लक्षणों से कहीं से यह प्रतीत होता है कि परिवार में आत्मिकता बनती है। जिस बच्चे को कभी सीने से नहीं लगाया, वह बच्चा अन्त में क्या करेगा, परिवार में रह कर तो उसने कुछ सीखा नहीं । उसने तो पाश्चात्यकरण की शैली देखी और वैसा ही आचरण एवं व्यवहार करेगा।
माँ औरत का ऐसा किरदार है, जिसमें सम्पूर्णता, पवित्रता, त्याग, ममता,प्यार व सब कुछ निहित होता है। दुनिया का क्या को अन्य रिश्ता है , जिसमें इतनी सारी खूबियां एक साथ होती हों।किसी कवि ने ठीक ही कहा है कि-
लबों पर उसके कभी बदुआ नहीं होती। बस एक माँ ही जो कभीं खफा नहीं होती।।
घेर लेने को मुझे जब भी बलाँ आ गई। ढाल बन कर सामने माँ की दुआएं आ गई।।
ऊपर जिसका अन्त नहीं उसे आसमां कहते हैं। इस जहाँ में जिसका अन्त नहीं उसे माँ कहते हैं।।
माँ के सच्चे प्यार और परवरिश को किसी भी चीज से तौला नहीं जा सकता है। अतः माँ एवं पिता अपनी औलाद के लिए सब कुछ करने को आतुर रहते हैं, चाहे कभी-कभी वो गलत ही क्यों न हों । लेकिन विडम्बना देखो वह माँ जिससे हम कई जन्मों में भी उऋण नहीं हो सकते, जब बुढापे की लाठी बनना होता है, उसे हम अकेला छोड देते हैं। जिन्दगी में उनकी कमाई उनके मकान सब एक तरफ करके निकाल देते हैं, जैसे दूध में गिरी मक्खी को । कैसी विडम्बना है वो माँ जिसका क्या ओहदा रहा है और आज वह कहाँ पहुच गई है। यह तो हद ही है माँ के दूध को इतना लजाना। और उस माँ को भी देखों आज हजारों माँएं वृद्धाश्रम में अपना जीवन व्यतीत कर रहीं हैं और आज उनसे पूछते हैं कि आप अपनी संतान के लिए क्या कहोगी तो भी कहती हैं भगवान उनको सुखी रखे। ऐसी होती है माँ।
आइये हम सब मिलकर इसके विरूद्ध खडे हों और ऐसा करने वालों को मानवता का पाठ पढाएं जिससे वे अच्छे संस्कारों में ढल सकें। जब उनमें प्रचीन काल से चली आ रही ऐसी पावन संस्कृति के पालनार्थ के प्रति मात्र वे अपनी नैतिक जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि अपना उत्तरदायिदत्व समझेंगे तो समाज में अच्छी परम्परा कायम होगी और ऐसे माँ-बाप वृद्धाश्रम नहीं पहुंच पांयेंगे।
खुदा का दूसरा रूप है माँ,ममता की गहरी झील है माँ।
वो घर किसी जन्नत से कम नहीं, जिस घर मे खुदा की तरह पूजी जाती है माँ।।
जय विश्वकर्मा।
आर. पी. शर्मा (जांगिड)

Saturday, March 3, 2018

संघर्ष ही जीवन है

भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डा. बाबा साहव भीमराव आम्वेडकर ने समाज के शोषित, पीडित, उपोक्षित और वंचित समाज के उत्थान हेतु एक नारा दिया था शिक्षित हो, संगठित हो, संघर्ष करों। इस नारे को आत्मसात करने के बाद ही आज वंचित समाज की पहचान बन सकी है। हालांकि यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है इसमें यदि शिथिलता बरती गई तो वंचित समाज दो कदम आगे बढने की बजाय चार कदम पीछे खिसक जायेगा।
विश्वकर्मा समाज की लोगों की लिए डा. भीमराव आम्वेडकर द्वारा दिया गया यह मंत्र संजीवनी साबित हो सकता है बशर्ते हम उसका अनुसरण करे सकें। क्योंकि गौरवशाली अतीत वाला विश्वकर्मा समाज संख्याबल और बुद्धिबल तथा बाहुबल में सक्षम होते हुए भी आजादी के सत्तर वर्षों के बाद राजनीतिक रूप से अपनी पहचान नहीं बना सका। कारण समाज के बुद्धिजीवी कहे जाने वाले नेतागण अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। लक्ष्य सबका एक है रास्ते अलग-अलग हैं। काशः हमारे बुद्धिजीवी नेतागण व्यक्तिगत महत्वकांक्षा और अहम को त्याग कर संगठित होकर संघर्ष करें तो निश्चित ही हम अपने लक्ष्य को हासिल कर सकेंगे। डा. आम्वेडकर ने संगठित होने और संघर्ष  करने से पहले शिक्षित होने पर जोर दिया। क्योंकि शिक्षित व्यक्ति ही संगठित होकर एक निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष कर सकता है और अपने समाज के उत्थान में एक सहायक बन सकता है। 
देर आये दुरूस्त आये की तर्ज पर ही विश्वकर्मा समाज के शिक्षित बन्धु विश्वकर्मा एकीकरण अभियान से जुड़े और अपने परिवार से एक सदस्य को अवश्य जोडें तभी हमारा समाज संगठित होकर संघर्ष कर सकेगा और संख्या बल के अनुरूप सत्ता मे भागीदारी हासिल कर सकेगा।  

Monday, January 29, 2018

विश्वकर्मा एकीकरण अभियान का प्रतीक V5 - संक्षिप्त विश्लेषण


विश्वकर्मा एकीकरण अभियान एक नव-जागरण है। एक नई सोच है, एक नई दिशा है और एक नई विचार धारा है। पहले से ही हजारों संगठनों में विभक्त विश्वकर्मा समाज के लिए एकीकरण अभियान पथ-प्रदर्शक है। यह अभियान युवाओं में नव चेतना एवं स्फर्ति का प्रदायक है, समाज को सत्ता में संख्यानुपातिक भागीदारी दिलाने का प्रयोजक है। विश्वकर्मा एकीकरण अभियान का सिद्धांत प्रत्येक परिवार से एक-एक स्वयं सेवकों को संगठित शक्ति पर आधारित है इसलिए विश्वकर्मा समाज का वह व्यक्ति जिसने 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर ली हो इस एकीकरण अभियान से जुड सकता है। यह एकीकरण अभियान न तो कोई समिति है, न कोई राजनीतिक दल है बल्कि यह एक मिशन है जो राजनीतिक होते हुए भी पूर्णतया अराजनीतिक है किन्तु इसका साध्य है विभिन्न माध्यमों द्वारा हमारे समाज की सत्ता में भागेदारी। सत्ता में भागेदारी वह कुंजी है जो किसी जातिध्विशेष वर्ग के विकास का द्वार खोलती है। अधिकांशतरू लोग विश्वकर्मा को हेय-दृष्टि से देखने की कोशिश करते हैं जवकि सच्चाई यह है कि विश्वकर्मा ब्रह्म है। शाश्वत शब्द है। यदि मूल को लोग भूल जाये तो फिर बचेगा ही क्या हम यह क्यों भूल जाते है कि जिसके कर्म से ही यह विश्व पैदा हुआ वही विश्वकर्मा है। अब स्थिति यह हो चुकी कि जो हमारा है वह दूसरों का हो गया है। अब कानून बदलने का साधन कहां से मिले  इसके लिए तो वोट चाहिए और वोट की राजनीति में संतुलन विगाडने की क्षमता हमने पैदा नही की। वर्तमान में जो वोट की राजनीति में संतुलन विगाड सकते हैं उन्हें  ही सत्ता की भागीदारी हासिल हो पाती है। वास्तव में इस मिशन के द्वारा समाज से स्वंय सेवकों का एक उत्कृष्ट कैडर तैयार करना ही इस अभियान की बुनियाद है इसी बुनियाद है इस बुनियाद पर एकीकरण का ढांचा पूरे हिन्दुस्तान में तैयार किया जा रहा है। स्वयं-सेवकों के दो सशक्त समूह जिसमें अभियान प्रचारकों और अभियान प्रेरकों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। यही इस अभियान की धुरी होंगे, इसी धुरी पर एकीकरण का स्वरूप परिलक्षित हो रहा है जो विश्वकर्मा समाज को सत्ता की दहलीज तक ले जायेगा, यही इस अभियान का मिशन है और इस मिशन का प्रतीक है V5जो दो चक्रों के भीतर प्रकाशमान है। यह दो चक्र इस अभियान के दो चरण (सोपान) है। प्रथम चरण V5 है अथवा विश्वकर्मा एकीकरण है । द्वितीय चरण विश्वकर्मा विजयतेतराम् अथवा सत्ता में भागेदारी। इस प्रतीक V5 में विश्वकर्मा के पांचो पुत्रों मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ के शिल्प का सन्निहित है और इस प्रतीक V5 के आलोक में समाज अपने तिरोहित गौरव का दर्शन कर सकेगा ऐसी संकल्पना का प्रतीक V5 है जो दो चक्रों के भीतर विराजमान है। बडे चक्र के ऊपरी भाग में विश्वकर्मा एकीकरण अभियान अंकित है और इसी चक्र के अधोभाग में विश्वकर्मा विजयतेतराम् का जय घोष रूपायित है। छोटे चक्र के भीतरी भाग में अंग्रेजी का अक्षर Vके साथ 5 का अंक सम्मृक्त है (एकीकृत) हैं। इस प्रकार यह प्रतीक V5विजयपथ (विजयतेतराम) पर बढ चलने का संदेश देता है। प्रतीक V5 का स्वरूप भौतिकता के साथ-साथ आध्यात्मिक संस्पर्श से अनुप्रमाणित है, इसलिए V-5 के आधि-भौतिक और आध्यात्मिक दो अर्थ किए गए हैं।
सृष्टि की रचना में पांच के अंक का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि विश्वकर्मा ने ही पांच महाभूतों से पंचीकरण कर के सृष्टि का शिल्पन किया है और शिल्प की अर्थवत्ता व सत्ता को इस दुनिया में स्थापित किया है। इसलिए शिल्पकर्म को यज्ञकर्म के रूप में निरूपित किया गया है। शिल्प कर्म के प्रत्येक सिद्धांत प्रथमतः विश्वकर्मा के माध्यम से उद्भूत होते हैं। शिल्पाधिपति के रूप में जिस विश्वकर्मा की सत्ता को स्वीकार किया गया है, वह पंचमुखी है। प्रथम सद्योजात पूर्व दिशा में, द्वितीय मुख वामदेव दक्षिण दिशा में , तृतीय मुख अघोर पश्चिम दिशा में , चतुर्थ मुख तत्पुरूष उत्तर दिशा में और पंचम मुख ईशान उर्ध्वस्थ ऊपर की ओर स्थित बताए गए हैं। इन पांच मुखों से पांच शैव पांचाल ब्राह्मण क्रमशः मनु, मय,त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ उत्पन्न हुए। इन पंच-ऋषियों से पांच शिल्प लौह, काष्ठ, ताम्र, पाषाण और स्वर्ण उद्भूत हुए। इस प्रकार पांच विश्वकर्मा पुत्र पंच शिल्प के उद्भावक पिता कहे गये हैं। इन पांच शिल्पों के  माध्यम से इस संसार को अलंकृत या विभूषित करने के कारण इन्हें पांचाल कहा जाता है- पंच्चाभिः शिल्पैः अलान्ति भूषयन्ति जगत इति पांच्चालाः। विश्वकर्मा के इन्हीं पांच पुत्रों में मनु से लौहकार, मय से काष्ठकार, त्वष्टा से ताम्रकार, शिल्पी से शिल्पकार और दैवज्ञ से स्वर्णकार वंश प्रवर्धमान हुए। जन्मदिक के अनुकूल मनु ने लौह शिल्प यज्ञशाला देश के पूर्व भाग में, मय ने काष्ठ शिल्प यज्ञशाला देश के दक्षिण दिशा में, त्वष्टा ने ताम्र शिल्प यज्ञशाला देश के पश्चिम दिशा में, शिल्पी ने पाषाण शिल्प यज्ञशाला देश के उत्तरी दिशा में और दैवज्ञ नै स्वर्ण शिल्प यज्ञशाला  देश के मध्य भाग में स्थापित की। इस योजनाबद्ध रीति से समाज के विकास एवं निर्माण से संबंधित पांचों शिल्पयज्ञ शालायें देश के प्रत्येक दिशाओं में पृथक-पृथक स्थापित कर राष्ट्र और समाज को एकता के सूत्र में बांधने का अनूठा उदाहरण विश्वकर्मा ने प्रस्तुत किया है। इसलिए इस उदाहरण को आत्मसात करते हुए V5  को विश्वकर्मा एकीकरण के प्रतीक चिन्ह के रूप में अंगीकृत किया गया है। इस प्रकार विश्वकर्मा के पांच मुख, पांच दिशाऐ, पांच पुत्र , पांच वंश और शिल्प का उद्बोधक है- विश्वकर्मा एकीकरण अभियान का प्रतीक V5
विश्वकर्मा एकीकरण अभियान का प्रतीक V5 भौतिकता के साथ-साथ इसका आध्यात्मिक पक्ष अत्यंत रोचक और श्लाघनीय है। विश्वकर्मा ऋग्वैदिकण युग का सर्वोच्च दैवीशक्ति का प्रतिनिधि है। ऋग्वेद के 10 वें मण्डल के सूक्त 81 व 82 में विश्वकर्मा ही इस सृष्टि का निर्माता देव है। शुक्ल यजुर्वेद अथवा वाजसनेजी संहिता के अध्याय 26 के 9 वें मंत्र के अनुसार विश्वकर्मा समस्त संसार तथा ब्रह्माण्डों का उत्पादक पिता कहा गया है- त्वष्टेदं विश्वम् भुवनम् जजान् । विश्वकर्मा को पूरे संसार एवं ब्रह्माण्डों का पिता इसलिए कहा गया है क्योंकि विश्वकर्मा ने ही विश्व के प्राणियों की रचना के लिए सर्वप्रथम निर्माण सामग्री का सृजन किया है और यही पांच निर्माण सामग्री पंच-महाभूत है अर्थात पृथ्वी, जल, वायु, अग्नी और आकाश है। यही पांच तत्व जगत की रचना के आधार हैं।
शिल्पाधिपति विश्वकर्मा के पांच मुखों को पंच ब्रह्म की संज्ञा दी गई है, ऐसा उल्लेख पद्मपुराण के कपिलगीता के अध्याय 3 के सूक्ति 25 पर उल्लेख है-
प्रथमं  वतारकाकारं द्वितीय दण्डमुच्यते, तृतीय कुण्डलाकारं चतुर्थचन्द्रकम् ।
पंचम बिन्दु संयुक्तं, प्रणवे ब्रह्म पंचकम।।
ये पांच ब्रह्म है। प्रथम तारकाकार ब्रह्म, द्वितीय दण्डाकार, ब्रह्म, तृतीय कुण्डलाकार ब्रह्म, चतुर्थ अर्धचन्द्राकार ब्रह्म और पांचवा बिन्दु रूप ब्रह्म। इन्ही पांच ब्रह्म आकारों से प्रवणक्षर अर्थात ओइम बनता है और यही ऊँ से समस्त भूत जिससे पैदा होते है, जन्मपाकर जिसके कारण जीवित रहते हैं और नष्ट होते ही जिसमें प्रविष्ट हो जाते है, वही जिज्ञासा योग्य है और वही ऊँ परब्रह्म विश्वकर्मा का प्रतीक है। विश्वकर्मा एकीकरण अभियान का प्रतीक ट5 , ऊँ का लौकिक स्वरूप है जिससे पांचों शिल्पों के उद्भावकों के वंशजों का एकीकरण गुफित स्वरूप में प्रकाशित है। यह पांच शिल्प- लौह, लकडी, तांबा, पत्थर और सोना है जो पंच महाभूत क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज (आग्नि),  और आकाश के रूपक है। यही मानव शरीर की रचना के सहायक तत्व है। इस प्रकार वैदिक युग से लेकर आज तक विश्वकर्मा की उपयोगिता समाज के सभी क्षेत्रों में इतनी बढी कि विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं निर्माणात्मक व्यवस्थओं  में उसकी अनिवार्यता स्थापित हो गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि विश्वकर्मा कोई जाति नहीं है। यह एक वर्ग है। विश्वकर्मा का संबंध किसी जाति विशेष से न होकर शिल्प के समग्र परिवेश से है। इसीलिए विभिन्न रूपों में शिल्प, उद्योग, प्रौद्योगिकी तथा कृषि आदि सभी कार्यों से जुडे वर्ग के लोग विश्वकर्मा है।
विश्वकर्मा से शिल्प की संज्ञा प्रादुर्भाव हुआ और विश्वकर्मा शिल्प का पर्याय बन गया । विश्वकर्मा देव तत्व है इसलिए उसके शिल्प में सौंदर्य है, पवित्रता है जीवन की स्थिरता, सुख और शांति है। विश्वकर्मा ब्रह्मा, तेज और ज्ञान के प्रतिनिधि है जो किसी भी समाज की व्यवस्था तथा उसकी गतिशिलता के लिए आवश्यक है। इसी उदान्त उद्देश्य की अभिव्यक्ति है  विश्वकर्मा एकीकरण अभियान का प्रतीक V5 ।
परन्तु आज भी विश्वकर्मा का देव तत्व स्वरूप तमाम प्रयासों के बाद भी पराभूत नहीं हो सका क्योंकि आज की सामाजिक सरंचना में शिल्पकर्म का सम्मान नहीं है इसलिए शिल्पी वर्ग अनादर के पात्र बन गये है चूकि आज की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में उन्हीं  लोगों की पूछं  है जो संगठित है, एक स्थान पर केन्द्रित है और जो वोट की राजनीति में सत्ता का संतुलन बिगाड सकते हैं, इसलिए विश्वकर्मा के पांचों शिल्पी-वर्गों को एकीकृत करके सत्ता में भागीदारी के माध्यम से  उनका वह पुराना गौरव पुनः दिलाना ही इस एकीकरण अभियान का उद्देश्य है जहां उन्हें राजत्व प्राप्त था।
आज विजयी वह वर्ग है जिसे राजत्व प्राप्त है और यह राजत्व की स्थिति हमारे समाज को तभी सम्भव है जब हम अपने समाज के पांच बाधक तत्वों यानी अहं, स्वार्थ, ईर्ष्या, आत्म विश्वास और  मतभेद पर विजय प्राप्त कर लेगें तभी सत्ता में संख्यानुपातिक भागी।दारी का मार्ग प्रशस्त होगा इसलिए अभियान का नारा है- विश्वकर्मा विजयतेतराम् यानी सत्ता में भागेदारी जो हमारी महत्वकांक्षा का द्योतक है और अभियान का प्रतीक V5 जो विश्वकर्मा एकीकरण का द्योतक है। यही प्रतीक V5 विश्वकर्मा समाज का भविष्य है अतः हमारी मंजिल है और विश्वकर्मा विजयतेतराम् हमारी महत्वकांक्षा है।
राम नरेश शर्मा
लखनऊ

सद्ग्रंथों का महत्व- तुलसी राम शर्मा ( सेशन जज से. नि.)


इस भूमण्डल (पृथ्वीलोक) पर हमारा देश भारत अपना अत्यंत विशिष्ट अलौकिक स्थान रखता आया है। मानव संस्कृति का यह सर्वोच्च केन्द्र रहा है। आध्यत्मिक ज्ञान की दृष्टि से हमारे इस भूखण्ड पर सर्वप्रथम ज्ञान का सूर्योदय हुआ और सदैव जगतगुरू के पद पर आसीन रहा। मानव सभ्यता के विकास मे हमारे देश से ही अन्य देशों में सांस्कृतिक प्रचार-प्रसार हुआ।
बहुत समय पूर्व हमारा क्षेत्र जम्बू द्वीप के नाम से विख्यात था। फिर उसे आर्यावृत के नाम से पुकारा जाने लगा। जब ब्रह्मऋषियों में महान ऋषभ देव जी के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र भरत का इस पृथ्वी पर एक छत्र साम्राज्य रहा तब हमारा देश भारत वर्ष के नाम से प्रसिद्ध हुआ और आज तक वही नाम हम अपनाए हुए हैं।
हमारे आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग साढे चार अरब वर्षों से हमारा यह ग्रह (पृथ्वी लोक) सूर्य भगवान की परिक्रमा करते आ रहा है। स्वाभाविक ही प्रतीत होता है कि यहाँ जीव सृष्टि अत्यंत दीर्घ काल से विद्यमान है। हमारे लिए अनुमान लगाना भी कठिन है कि मानव कब से धरती माता पर विचरण कर रहा है। पाश्चात्य जगत इस विषय पर लगभग मूक साधे हुए है। लेकिन हमारे प्रचीन ग्नन्थों से तो ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि रचना से ही मानव का मृत्युलोक में प्राकट्य सिद्ध होता है। ब्रह्मा जी ने सर्व प्रथम मानसी रचना की और सनकादि ऋषियों को उत्पन्न किया । वे मानव सृष्टि का विस्तार नहीं कर पाए। वे तो ब्रह्म ज्ञान में ही लीन रहने लगे। तब ब्रह्म देव ने मैथुनी सृष्टि की उपाय सोचा और मनु व शतरूपा को प्रकट किया। उन दोनों के संयोग से इस भूमण्डल पर विस्तार हुआ और आज हम देख रहे हैं मानव ने पृथ्वी पर कहाँ तक प्रगति करते हुए इस ग्रह को लबालब भर दिया है।
यह सत्य है अनादिकाल से मानव सृष्टि का विकास इस पृथ्वी लोक पर होता चला आ रहा है। कभी उद्भव तो कभी ह्रास। यह प्रक्रिया चली आ रही है। माव सभ्यता को सबसे भीषण आघात तब पहुंचा जब लगभग 5000 वर्ष पूर्व इस पृथ्वी का भार उतारने के उद्देश्य से भगवान कृष्ण की इच्छा से कुरूक्षेत्र के मैदान पर महाभारत नामक सर्व विनाशकारी महायुद्ध सम्पादित हुआ। इस महा युद्ध में 18 अक्षोहिणी सेनाओं ने भाग लिया, जिसमें 11 अक्षोहिणी सेनाएं कौरवों की थी व 7 अक्षोहिणी सेनाएं पाण्डवों के पक्ष में सम्मिलित हुई। इस भूमण्डल के सभी राजा-महाराजा अपने अपने राष्ट्रों की सेनाएं लेकर महाभारत में उपस्थित हुए और उन सबका खात्मा हो गया। इस महायुद्ध में तत्कालीन संस्कृति का ह्रास हो गया। सर्वत्र अराजकता फैल गयी। न राजा रहे और न प्रजा पालन की सुचारू व्यवस्था। एक प्रकार से सर्वत्र सांस्कृतिक अंधकार छा गया और वैदिक सभ्यता का अंत सा हो गया। चोरों-लुटेरों ने राज्य सत्ता पर अपना अधिपत्य जमा लिया और प्रजा अधोगति में धकेल दी गई। न वर्णश्रम की प्रणाली बच पाई और न सामाजिक कर्म व्यवस्था ही।
इस सोचनीय स्थिति में सभ्यता की किरण पुनः प्रस्फुटित हुई जब 2500 वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध का इस मुल्क में पदार्पण हुआ और उनके द्वारा बौद्ध धर्म की चहूं और स्थापना हो पाई। मानव समाज को उनके द्वारा अहिंसा का पाठ पढ़ाया गया। उनके अनवरत प्रयासों के फल स्वरूप बौद्ध धर्म आसपास के सभी मुल्कों में श्री लंका, म्यांमार, मलेशिया, इण्डोनेशिया, जापान होते हुए चीन तक पहुंच गया और भारत वर्ष पुनः जगतगुरू के सम्मानित पद पर आसीन हो गया।
लगभग 1000-1500 वर्ष तक बौद्ध धर्म का वर्चस्व बना रहा, परन्तु उसमें विकृतियां पनपने लगीं और अद्योगति के कगार पर खडा हो गया। ऐसे समय में दक्षिण से जगदगुरू शंकराचार्य का प्राकट्य हुआ, जिन्होंने 32-33 की अल्प आयु में बौद्ध धर्म को उखाड़ फैंका और सनातन धर्म की भारत में पुनः स्थापना कर दी।
भारत वर्ष में सनातन धर्म की पुनः स्थापना तो हो गई मगर राज्य व्यवस्था दयनीय स्थिती में थी। देश का कोई सम्राट नहीं था। छोटे-बडे अनेक राजा राज्य करते थे और उनमें भी आपसी वैमनस्य रहता था। एक जुट होकर कोई राज्य व्यवस्था नहीं थी। इसका ज्वलंत उदाहरण अजमेर के राज्य और कन्नौज के राज्यों की बीच मन-मुटाव देखने में आता है। कन्नौज के राजा जयचंद ने बार-बार मुसलमान बादशाह मोहम्मद गोरी को आमंत्रित किया कि वह अपनी सेना लेकर आये और अपने प्रतिद्वंदी के राजा पृथ्वीराज चैहान को युद्ध में पराजित करे। राजाओं के बीच दुर्मति के फलस्वरूप मुसलमानों ने शनै- शनै सारे भारत वर्ष पर अपना शासन स्थापित कर लिया और हिन्दु जनता का बहुत बडे पैमाने पर इस्लामीकरण होने लगा। हमारा देश लगभग एक हजार वर्षों तक मुसलमान बादशाहों  के अधीन रहा और फिर उनमें अव्यवस्था फैल जाने से अंग्रेजों ने इस पर अधिपत्य कर लिया। उन्होंने भी लगभग 200-250 वर्षो तक शासन किया और शिक्षा द्वारा यहाँ की संस्कृति को ही बदल डाला। हम हमारी प्राचीन संस्कृति को जड़ से ही समाप्त कर चुके हैं और पाश्चात्य सभ्यता के गुलाम बन बैठे ।
उपरोक्त वृतांत का तात्पर्य केवल इतना बताना मात्र है कि किस प्रकार हमारा मानव समाज अपनी सर्वोत्तम आध्यत्मिक संस्कृति से विलग हो एक नकली जीवन शैली के पाश मे आ बंधा है। क्या हमारे उन महान ऋषि-मुनि, महर्षि-ब्रह्मऋर्षियों द्वारा उत्कृष्ट तपस्या से प्राप्त मानव उत्थान की वह शैली अब निरर्थक हो गई? जब तक हम हमारे महान मनीषियों द्वारा प्रतिपादित आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया को नहीं अपनाऐंगे, इस आधुनिक भोग-विलास की संस्कृति से पीछा कदापि नहीं छुडा पाएंगे और न भूमण्डल को विशाल जन समुदाय की जीवन की सही राह दिखाने में सफल हो सकेंगे।
हमारी प्रचीन  संस्कृति से जुडने के लिए हमारे लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम हमारे बचे-कुचे प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें। हम अपने दैनिक कामकाज के दौरान कुछ समय स्वाध्याय के लिए अवश्य सुनिश्चित करें। जो समय हम टी.वी. सीरीयल इत्यादि देखने में व्यर्थ में प्रतिदिन खोते रहते हैं, उसमें से कुछ क्षण हमारी उच्च कोटि की संस्कृति का अवलोकन में तो लगावें। आज भी जो प्राचीन ग्रंथ हमें उपलब्ध हैं, उनमें वह अमूल्य आध्यात्मिक ज्ञान भरा पडा है, जिससे हम अपने मानव जीवन का उत्कृष्ट फल प्राप्त कर सकते हैं। उनमें से कुछ ग्रंथों का संक्षेप में विवरण प्रस्तुत करना प्रासंगिक होगा।
1. श्रीमद्भवाल्मीकी रामायण रू यह सुप्रसिद्ध ग्रंथ अत्यंत प्राचीन त्रैतायुग कालीन हमें बडे भाग्य से उपलब्ध है। इसमें भगवान श्री राम के अवतार की संपूर्ण कथा है। त्रैता युग में हमारी कैसी सभ्यता थी, मानव समाज का कैसा आचरण था और भगवान राम ने मानव मात्र को श्रेष्ठ जीवन जीने का कैसा सुन्दर उपदेश दिया। मानव जीवन की सर्वोत्तम शिक्षाप्रद है। महर्षि बाल्मिकी श्री राम के अवतार के समकालीन थे और इस ग्रंथ में उस समय की सारी घटनाओं की अक्षरशः बड़ा चित्ताकर्षक चित्रण मिलता है।
2. महाभारत रू महर्षि वेदव्यास द्वारा विरचित यह ग्रंथ द्वापर युग के अन्तिम वर्षों लगभग 5000 वर्ष पुराना है। उस काल में कौरव-पाण्डव के मध्य भीषण युद्घ हुआ था। उसका विशद वर्णन इस ग्रंथ में हमें प्राप्त होता है, साथ ही उस काल में राजकीय-सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था कैसी थी, मानव समाज की जीवन शैली कैसी थी। इन बातों का लोमहर्षक वर्णन इस ग्रंथ में भरा पडा है। यह ग्रंथ बडा रोचक एवं ज्ञान वर्धक है। इसका स्वाध्याय बडा हितकारी सिद्ध होगा।
3. श्रीमद्भगवद्गीता रू आध्यात्मिक ज्ञान का यह सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है और सारे विश्व में इसकी मान्यता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विकट समय में जबकि दोनो ओर की सेनाएं कुरूक्षेत्र की रणभूमि में युद्ध में प्रवृत होने को तैयार थी, उसके विषाद को दूर करने हेतु जो शिक्षा दी-प्रवचन किया वह मानव मात्र को लिए उपयोगी सिद्ध हुआ है। हमारा हिन्दु परिवार इस ग्रंथ को स्वाध्याय हेतु अवश्य अपने घर में रखे।
4. श्रीमद्भागवत (महापुराण) रू यह सर्व श्रेष्ठ ग्रंथ भी महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित है। इसमें भगवान कृष्ण की लीलाओं का बड़ा ही राचक वर्णन है। साथ ही इसमें आध्यात्मिक ज्ञान तो भरा पडा है। हमारी प्रचीन संस्कृति को अत्यंत विश्द रूपेण दर्शाया गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह ग्रन्थ अद्वितीय है। इसमें सृष्टि की रचना व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, स्थिति व लय के संबंध में विशद वर्णन है। हमारे प्रचीन ऋषि-मुनियों ने आध्यात्मिक क्षेत्र में कितनी प्रगति की थी, इसमें सूक्ष्मतम उल्लेख हुआ है।
5. रामचरितमानस रू  गोस्वामी तुलसीदास जी कृत आधुनिक युग का यह अनपुम ग्रंथ है। हर भारतवासी को इसे घर में रखना चाहिए और सपरिवार इसका पठन-पाठन करना चाहिए। बालकों में अच्छे संस्कार स्थापित करने में ऐसे ग्रंथों का बडा महत्व है और परिवारिक जीवन में सुख-शांति हेतु इसका स्वाध्याय परम आवश्यक है। वैसे यह ग्रंथ वाल्मिकी रामायण पर आधारित है मगर इसमें गोस्वामी जी ने भक्तियोग का जो पुट दिया है वह अनुकरणीय है।
6. नाभा जी विरचित भक्तमाल रू  यह भी हमारे आध्यात्मिक भण्डार का अद्वितीय ग्रंथ है और आधुनिक काल का है। ये दोनो ग्नंथ लगभग 400 वर्ष पूर्व प्रकाशित हुए और हिन्दु समाज में प्रभु भक्ति रस का संचार करने में अद्वितीय स्थान रखे हुए विद्यमान है।

उपरोक्त ग्रंथ प्रत्येक हिन्दु के घर में शोभा पाना चाहिए। इनके पठन-पाठन से सारा परिवार लाभान्वित होगा और सात्विक जीवन परिपुष्ट होकर सुख-शान्ति का प्रसार होगा। बगैर आध्यत्मिक पुट में मानव जीवन का वास्तविक लाभ प्राप्त करना कठिन है। वर्तमान समय की भोग-विलास की संस्कृति ने मानवता  का जितना नुकसान कर डाला है वैसा तो कई सदियों  से इस धरा धाम पर नहीं हुआ। हम आशा करते हैं हमारा समाज इन ग्रंथों के स्वाध्याय द्वारा अपने जीवन को संमार्ग पर स्थापित करने में ईश कृपा से सफल होगा।
- तुलसी राम शर्मा ( सेशन जज से. नि.)
जयपुर, राज. फोन.-0141-2706129

उत्तर प्रदेश एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड (श्रम विभाग) के पंजीकृत श्रमिकों के हितार्थ चलाई जा रही विभिन्न लाभकारी योजनाएं-


1. कामगार मृत्यु एवं विकलांग सहायता योजना -  (रू. 100000 से 500000 तक)
2. मातृत्व हितलाभ योजना ( पंजीकृत पुरूष रू. 3000 व पंजीकृत महिला होने पर रू. 6000)
3. शिशु हितलाभ योजना- (रू.10000 पुत्र होने पर 12000 पुत्री होने पर)
4. मेधावी छात्र पुरस्कार योजना ( रू. 2000 से 12000 तक)
5. शिक्षा सहायता हेतु छात्रवृत्ति योजना (रू. 100 से 12000 तक प्रतिमाह )
6. कामगार अंत्योष्टि सहायता योजना (पंजीकृत श्रमिक की मृत्यु पर रू. 25000)
7. निर्माण कामगार गम्भीर बीमारी सहायता योजना (व्यय पूर्ति शतप्रतिशत)
8. निर्माण कामगार बालिका मदद योजना (एक वर्ष तक पंजीकृत रहने पर पुत्री के नाम 18 वर्ष के लिए रू.20000 की एफ.डी.)
9. निर्माण कामगार पुत्री विवाह अनुदान योजना (रू.55000 पंजीयन के उपरांत 3 वर्ष तक अंशदान जमा करने पर दो पुत्रियों हेतु)
10. अक्षमता पेंशन योजना (रू.100 प्रतिमाह)
11. सौर उर्जा सहायता योजना (सोलर उपकर नेडा के माध्यम से दिये जायेंगे उरोक्त योजनाओं का लाभ निर्धारित शर्तों के अधीन होगा)
12. निर्माण कामगार आवास सहायता योजना (जिनके पास स्वयं अथवा परिवार के नाम 20 वर्ग मीटर भूमि उपलब्ध हो, उनको कार्यस्थानध्निवास एक ही जिले में होने पर उन्हें , वरीयता प्रदान की जायेगी)
13. पेंशन योजना ( पंजीकृत श्रमिक द्वारा 60 वर्ष की आयु पूर्ण होने के उपरांत रू. 1000 प्रतिमाह)
14. मध्याह्न भोजन सहायता योजना  (पंजीकृत निर्माण श्रमिकों को सस्ते दर पर भोजन उपलब्ध कराया जाना)
15. साईकिल सहायता योजना  ( पंजीकृत निर्माण श्रमिकों को)
पंजीकृत हेतु पात्रता एवं प्रक्रिया
ऐसे सभी निर्माण श्रमिकों जो कि 18 से 60 वर्ष की आयु के हैं और उन्होंने पंजीकरण के समय पिछले  12 महीनों में 90 दिनों तक श्रमिकों के रूप में कार्य किया जाता हो
निर्माण श्रमिक श्रम विभाग के जिला स्तरीय कार्यालय से निःशुल्क पंजीकरण फार्म प्राप्त कर सकता है।
पंजीकरण फार्म के साथ दो फोटो, आधार कार्ड, निर्माण श्रमिक के रूप में गत 12 महीनों में 90 दिनों तक कार्य करने का प्रमाण-पत्र सहित रूपया 50 पंजीकरण शुल्क व रूपया 50 एक वर्ष का अंशदान जमा कर पंजीकरण संख्या सहित श्रमिक पहचान-पत्र प्राप्त कर सकते हैं।
निर्माण श्रमिक को प्रत्येक वर्ष रू 50 का अंशदान जमाकर विभिन्न योजनाओं में लाभ प्राप्त करने हेतु अपने पंजीकरण की निरंतरता रखनी होगी।
अधिक जानकारी के लिए टोल फ्री न. 18001805412 पर संपर्क करें।

Monday, January 15, 2018

30 इंच व्यास की आरा मशीन लाइसेंस से मुक्त की जाये- नरेश पांचाल

शाहजहांपुर । सरकार ने विगत 4 दिसंबर को जारी शासनादेश के तहत 30 सेमी व्यास के पहिये की आरा मशीन लाइसेंस से मुक्त की है और विशेष परिस्थितियों में 60 सेमी की आरा मशीन को लाइसेंस से मुक्ति का अधिकार राज्य स्तरीय समिति को दिया है जो व्यवहारिक नहीं है और विश्वकर्मा समाज के लघु काष्ठकार फर्नीचर उद्योग से जुडे लोगों को उससे कोई लाभ होने वाला नही है।
          विश्वकर्मा एकीकरण अभियान के प्रदेश प्रभारी राम सुमिरन शर्मा एवं सह प्रभारी नरेश पांचाल ने विगत 13 जनवरी को मुख्य मंत्री को संबोधित एक पत्र प्रदेश के संसदीय कार्य व नगर विकास मंत्री सुरेश कुमार खन्ना को सौप कर 30 इंच व्यास की व्हील वाली आरा मशीन लाइसेंस मुक्त किये जाने की मांग की। श्री खन्ना ने विश्वकर्मा समाज के व्यापक हित में मुख्यमंत्री  व वन मंत्री का उक्त मांग पर सहानुभूति पूर्वक विचार कर कार्यवाही किये जाने की अनुशंसा की है।

          इसके अतिरिक्त विश्वकर्मा एकीकरण अभियान के माध्यम से विश्वकर्मा समाज को संख्या बल के अनुरूप सत्ता में भागेदारी दिये जाने और नगर पालिका, नगर निगम में नामित सभासद और शासन की समितियों, जेल विजिटर तथा शासकीय अधिवक्ता के पदों पर विश्वकर्मा समाज के जुझारू व सक्रिय कार्यकर्ताओं का नामित किये जाने की मांग करते हुए प्रदेश के मुख्य मंत्री को संबोधित एक पत्र भी श्री खन्ना को सौंपा। जिस पर खन्ना ने इस विषय में प्रदेश के संगठन महामंत्री श्री सुनील बंसल से वार्ता कर विश्वकर्मा समाज की सत्ता मे भागेदारी सुनिश्चित किये जाने का आश्वासन दिया। उक्त दोनों पत्र प्रदेश के मुख्य मंत्री मा. योगी आदित्यनाथ को भी प्रेषित किये गये हैं।

Thursday, December 14, 2017

समाज में बढ़ रही नशे की लत-हिमांशु विश्वकर्मा


खुद बिगड़े हो तुम जो अब तो
बच्चों को क्या सिखलाओगे,
खुद जो करने लगे नशा हो
उनको कैसे बचाओगे?
कोई भी माँ बाप अपने बच्चों के लिए आदर्श होते हैं, उनको देख कर ही बच्चे जीवन की पहली पाठशाला शुरू करते हैं। माँ बाप के क्रिया कलापों से बच्चे अपने भविष्य की सीख लेते हैं, किन्तु जब माँ बाप ही बच्चों के सामने नशे का सेवन करने लगते हैं तो बच्चे भी उनको देख कर नशे की तरफ अग्रसर होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। कई माँ तो गर्भ में शिशु होने के उपरांत भी पौष्टिक आहार की जगह गुटखा, तम्बाकू इत्यादि का सेवन करती हैं, तो इस प्रकार तो जन्म से पहले ही शिशुओं की रगो में नशा समाता जा रहा है।

आज नशा हमारे समाज के लिए एक विकराल समस्या बनता जा रहा है, हम अपने बचपन से सुनते आ रहे हैं कि, नशा एक बुरी लात है। और सब कुछ सुनने समझने के बाद भी आदमी स्वयं को इस जाल में फंसने से नहीं रोक पाता, पता नहीं ऐसा क्या है इस नशे मे? ये एक ऐसा दीमक है जो समाज को अंदर ही अंदर कमज़ोर कर रहा है। एक 25-30 वर्ष का युवा सुबह होते ही अपनी दिनचर्या गुटखा, सिगरेट, तम्बाकू इत्यादि से शुरू करता है, वह नित्य क्रियाएँ बाद में करता है, नशे का सेवन पहले करता है। सरकार समाज की हितैषी होती है, जो समय समय पर समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, सोशल मीडिया, टी वी चैनलों, रेडियो इत्यादि के माध्यम से नशे से होने वाले दुष्परिणामों से जनता को जागरूक करती है। आप टी वी पर कोई फ़िल्म देखें जैसे ही कोई व्यक्ति धूम्रपान करता दिखता है, तुरंत ही नीचे छोटे अक्षरों में लिख कर आ जाता है, "धूम्रपान स्वस्थ्य के लिए हानिकारक है, इस से कर्क(कैंसर) रोग होता है". यह सब क्यों है, सिर्फ आपकी सुरक्षा के लिए, लेकिन उसके बाद भी हम नहीं चेतते हैं, शराब की बोतलों, गुटखे के पैकेटों, सिगरेट, बीड़ी, इत्यादि पर लिखी चेतावनी को नज़र अंदाज़ करके हम इन नशा संबंशी सामग्री को एक बार में गटक जाते हैं।
नशा घर के खुशियों भरे माहौल में भी आग लगा देता है, बड़े बड़े घर नशे की आग में तिनके की तरह जल जाते हैं। नशा करने के बाद व्यक्ति का अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण समाप्त हो जाता है, और जिसके कारण वह घर में गाली, गलौज, मार पीट इत्यादि करने लगता है, जिसका परिवार पर बुरा असर पड़ता है, विशेष रूप से बच्चों पर। बच्चे तनाव में रहने लागतें हैं, जिसके कारण  उनकी शिक्षा, एवं आचार व्यवहार पर बुरा प्रभाव पड़ता है, और इन सब कारणों के चलते उनका भविष्य भी गर्त में चला जाता है। महिलाएं तनाव में रहती है, परिवार की शांति भंग हो जाती है और कई बार नशे से प्रभावित हो कर वे आत्महत्या तक करने का निर्णय ले लेती हैं।
नशे का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव स्वस्थ्य पर पड़ता है, आज कल देखा गया है की कम आयु में ही बच्चों, नौजवानो, पुरुषों को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो जाती है जिसका इलाज़ काफी महंगा भी है, और समय से इलाज न मिल पाने के कारण एवं धन के आभाव में परिवार अपना एक महत्वपूर्ण सदस्य खो देता है, जिसका दंश वह परिवार जीवन भर झेलता है। आखिर ऐसा क्या ज़रूरी है इस नशे में जो आपके व आपके परिवार की खुशियों में आग लगा दे। विश्वकर्मा समाज भी इस से अछूता नहीं है। मेरा निवेदन अपने समाज व अन्य समाज के सभी उन लोगों से है, जो किसी भी प्रकार का नाश करते हैं, मेरी उनसे हाँथ जोड़ कर विनती है, की कृपया नशे को आज से ही तिलांजलि दें, एवं खुशियों को अपनाये, एवं बच्चों को अच्छी शिक्षा दे, और उनको देश की सेवा के लिए एक अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करें। मेरा लेख पढ़ने के बाद यदि एक वयक्ति भी नशा छोड़ता है, तो मैं समझूँगा कि मेरा ये लेख लिखना सार्थक रहा।
धन्यवाद्
आपका:
हिमांशु विश्वकर्मा
सहायक प्रबंधक
भारतीय स्टेट बैंक
मुख्या शाखा, गोरखपुर

मोब. 9451149914